सनातन रहस्य :

मंगल ग्रह :-

सनातन संस्कृति में बहुत सी बातें सांकेतिक बताई जाती रही है , या फिर कहानियों के माध्यम से । क्योंकि उस समय हर जगह लिखने के साधन नही थे और कहानियों के माध्यम से ज्ञान सरलता से प्रचार प्रसार हो जाता है , जैसे कि हम हिंदुओं में मंगल ग्रह को पृथ्वी का पुत्र कहा जाता है बहुत पहले से ही ,कहानियों में और देखो पूरे सौरमंडल में पृथ्वी के बाद मंगल ही है जिसमे जीवन की संभावना है । शायद आपको हसी आए और सच पर सबको हसी आती ही है पर विज्ञान के अनुसार माता के गुण पुत्र से मिलते हैं इसलिए सांकेतिक रूप में मंगल को पृथ्वी का पुत्र कहा गया ( पुत्री नही ) । महाकाव्य भी ऐसे ही लिखे जाते हैं संकेत में न कि सीधे सीधे चाहे तो अभी की हरिवंश राय जी की कविता पढ़ लीजिये उसके अर्थ भी सीधे नही हैं गुण बातें हैं उसमें भी ।

:- ( एकलव्य )

उदाहरण के किये एकलव्य से उसका अंगूठा मांगना गुरु द्रोणाचार्य के द्वारा कितना बड़ा झूठ है वामपंथी साहित्य का जबकि महाभारत में ऐसा नहीं हुआ था । गुरु ने गुरु दीक्षा में बस इतना मंगा की तुम भाविष्य में होने वाली किसी भी लड़ाई में भारत वंश (कौरव+पांडव दोनो) में किसी से भी युद्ध नही करोगे । इस बात पर एकलव्य ने कहा ऐसी दीक्षा मांगकर तो अपने जैसे मेरे दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया हो महाभारत महाकाव्य है मुहावरों और ऐसे शब्दों का उपयोग होता है काव्य में जिसके सीधे अर्थ नही होते पर समझे कौन बस सुनी सुनाई बात को सच मान लिया गया ।

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