कृष्ण की काल गणना - ऐतिहासिक पुरुष अथवा किवदंती
श्रीकृष्ण का ऐतिहासिक काल-निर्धारण: पारंपरिक पीठों, खगोल-विज्ञान और पुरातत्व की संयुक्त दृष्टि
भारतीय संस्कृति और दर्शन के केंद्रबिंदु भगवान श्रीकृष्ण के ऐतिहासिक कालखंड को लेकर प्राचीन काल से आज तक गहन विमर्श होता रहा है। पारंपरिक धर्माचार्यों, आधुनिक खगोल-वैज्ञानिकों और पुरातात्विक शोधकर्ताओं ने विभिन्न पद्धतियों का आश्रय लेकर उनके प्राकट्य और लीलाकाल का समय निर्धारित करने का प्रयास किया है।
इन विविध अध्ययनों में धार्मिक पीठों की परंपरा, आधुनिक कंप्यूटर-आधारित खगोलीय सिमुलेशन तथा पुरातात्विक उत्खनन मुख्य आधार बने हैं।
1. पारंपरिक पीठों का दृष्टिकोण: श्रृंगेरी शारदा पीठ एवं कलि संवत
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित आम्नाय पीठों (विशेषकर दक्षिणाम्नाय श्रृंगेरी शारदा पीठ तथा कांची कामकोटि पीठ) में काल-गणना का आधार प्राचीन पौराणिक सिद्धांत और कलि संवत है।
कलि संवत और श्रीकृष्ण अंतर्धान: विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत तथा ऐहोल शिलालेख (पुलकेशी द्वितीय, 634 ईस्वी) के अनुसार, जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेटकर पृथ्वी से गोलोक गमन किया, उसी दिन से कलियुग का प्रारंभ माना जाता है। यह तिथि खगोलीय और पंचांगीय गणना के अनुसार 3102 ईसा पूर्व (3102 BCE) तय है।
125 वर्ष की पूर्णायु: ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण धरा पर 125 वर्ष तक उपस्थित रहे। अतः कलि के आरंभ से 125 वर्ष पूर्व उनका प्राकट्य हुआ।
जन्म वर्ष: इस प्रकार श्रृंगेरी पीठ और पारंपरिक पंचांगों के अनुसार उनका जन्म लगभग 3227–3228 ईसा पूर्व बैठता है। वर्तमान समय से गणना करने पर यह समय आज से लगभग 5,250 वर्ष पूर्व सिद्ध होता है।
2. डॉ. नीलेश ओक का खगोलीय अनुसंधान (5561 ई.पू. मत)
आधुनिक खगोल-पुरातत्ववेत्ता (Archaeo-astronomer) डॉ. नीलेश नीलकंठ ओक ने पारंपरिक और आधुनिक इतिहासकारों से भिन्न एक अत्यंत प्राचीन तिथि प्रस्तावित की है।
अरुंधति-वशिष्ठ अवलोकन (AV Observation): महाभारत के भीष्म पर्व में उल्लेख है कि आकाश में अरुंधति तारा अपने पति वशिष्ठ (Mizar & Alcor) के आगे चलता हुआ दिखाई दे रहा था। पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन (Axial Precession) के कारण यह खगोलीय स्थिति केवल 11091 ईसा पूर्व से 4508 ईसा पूर्व के बीच ही घटित हो सकती थी।
महाभारत युद्ध वर्ष: 500 से अधिक खगोलीय, समुद्र-वैज्ञानिक और मौसम संबंधी श्लोकों का कंप्यूटर मॉडलिंग द्वारा विश्लेषण करने के बाद डॉ. ओक ने महाभारत युद्ध का सटीक वर्ष 5561 ईसा पूर्व निर्धारित किया है।
श्रीकृष्ण का काल: महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद श्रीकृष्ण का महाप्रयाण (लगभग 5525 ई.पू.) हुआ। यदि युद्ध के समय वे लगभग 80–90 वर्ष के रहे हों, तो डॉ. ओक के निष्कर्षों के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म 5600 ईसा पूर्व से अधिक पुराना ठहरता है, जो आज से लगभग 7,600 वर्ष पूर्व का समय है।
3. आधुनिक खगोल-गणना (कंप्यूटर सिमुलेशन विधि)
नासा के पूर्व वैज्ञानिकों और अकादमिक शोधकर्ताओं ने भी आधुनिक सॉफ़्टवेयर (जैसे SkyMap, Lodestar Pro और Planetarium) के जरिए महाभारत के संदर्भों का परीक्षण किया है:
अरुण के. बंसल एवं पारंपरिक खगोलविद: इन्होंने रोहिणी नक्षत्र, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी और मध्यरात्रि के लग्न-संयोजन की गणना की। इनके अनुसार यह अद्वितीय ग्रह स्थिति 19–21 जुलाई, 3228 ईसा पूर्व को बनी थी, जो श्रृंगेरी पीठ और कलि संवत की पारंपरिक मान्यता से पूरी तरह मेल खाती है।
प्रो. बी.एन. नरहरि आचार (मेम्फिस विश्वविद्यालय) व डॉ. एस. बालकृष्ण: इन्होंने महाभारत के ग्रहों के गोचर का सिमुलेशन करके युद्ध का वर्ष 3067 ईसा पूर्व निर्धारित किया, जिसके आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग 3112 ईसा पूर्व (आज से लगभग 5,100 वर्ष पूर्व) माना जाता है।
4. पुरातात्विक साक्ष्य और कार्बन डेटिंग
जहाँ खगोलीय पद्धतियाँ 5,000 से 7,500 वर्ष पूर्व का समय दर्शाती हैं, वहीं भौतिक साक्ष्यों पर निर्भर आधुनिक पुरातत्ववेत्ता इसे अपेक्षाकृत नवीन कालखंड में देखते हैं:
डॉ. एस.आर. राव (जलमग्न द्वारका उत्खनन): भारत के प्रमुख समुद्री पुरातत्ववेत्ता डॉ. एस.आर. राव ने गुजरात के तट पर जलमग्न द्वारका के अवशेष खोजे। वहाँ प्राप्त पाषाण-लंगर, मिट्टी के बर्तन और मुहरों की थर्मोल्युमिनेसेंस तथा कार्बन डेटिंग से वह सभ्यता 1500 से 1700 ईसा पूर्व की सिद्ध हुई। इस आधार पर डॉ. राव ने श्रीकृष्ण का समय लगभग 3,500 से 3,700 वर्ष पूर्व निर्धारित किया।
प्रो. बी.बी. लाल (हस्तिनापुर एवं PGW संस्कृति): पूर्व ASI महानिदेशक प्रो. लाल ने कुरुक्षेत्र, हस्तिनापुर और मथुरा में 'चित्रित धूसर मृदभांड' (Painted Grey Ware) संस्कृति के आधार पर महाभारत काल को 900 से 1000 ईसा पूर्व के मध्य रखा (आज से लगभग 2,900 से 3,000 वर्ष पूर्व)।
निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण के काल-निर्धारण के प्रयास यह सिद्ध करते हैं कि भारतीय वांग्मय में खगोलीय और भौगोलिक घटनाओं का अत्यंत विशद और सजीव अभिलेखीकरण उपलब्ध है।
जहाँ श्रृंगेरी पीठ और पारंपरिक पंचांगकार कलि संवत के आधार पर उन्हें 5,250 वर्ष पूर्व स्थापित करते हैं, वहीं डॉ. नीलेश ओक के खगोलीय साक्ष्य इसे 7,600 वर्ष पूर्व तक पीछे ले जाते हैं। दूसरी ओर, पुरातात्विक साक्ष्य भौतिक अवशेषों के आधार पर इसे 3,000 से 3,700 वर्ष पूर्व का समय मानते हैं। ये सभी शोध इस बात की पुष्टि करते हैं कि श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता पर अब विश्वभर के शोधकर्ता गंभीरता से काम कर रहे हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें