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मौर्य राजवंश और बस्तर एक संभावना

हम सभी को पता है कि मौर्य राजवंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा की गई थी अपने गुरु विष्णु गुप्त अर्थात चाणक्य द्वारा मार्ग दिखाने पर । चंद्र गुप्त मौर्य किस तरह से एक सम्राट बने इसके ऊपर हमारे इतिहासकारो द्वारा विस्तृत जानकारी दी गई है । पर हम यहां पर उनकी कहानियों पर नहीं जाएंगे , हम चलते हैं इन कहानियों के थोड़ा पीछे चंद्रगुप्त मौर्य अथवा यह मौर्य उपनाम कहां से आता है । चाणक्य का मुख्य स्थान देखा जाए तो वह था तक्षशिला और इसी तक्षशिला में उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को शिक्षा भी दी थी । अगर गौर किया जाए तो चाणक्य चंद्रगुप्त के गुरु बनने के पूर्व धनानंद के दरबार पर गए थे और उन्होंने धनानंद को सेना एकत्र कर बाहरी यवन आक्रमण के प्रति तैयार रहने हेतु सहायता मांगी थी । इतिहास में हमें बहुत अधिक स्रोत तो नहीं मिलते पर एक आकलन यह किया जा सकता है कि तक्षशिला के तत्कालीन राजा द्वारा हो सकता है चाणक्य को एक दूत बनाकर भेजा गया हो धनानंद से सहायता मांगने । अथवा यह भी हो सकता है कि चाणक्य अपने देश भक्ति और राष्ट्र निष्ठा के कारण धनानंद के पास सहायता हेतु गए होंगे । धनानंद द्वारा चाणक्य का एक ब्र...

शिक्षा क्षेत्र, पैसे का खेल और धर्मांतरण का बढ़ता प्रभाग

बस्तर में मिशनरी शिक्षण संस्थान और धर्मांतरण: एक वित्तीय विश्लेषण और विचारणीय प्रश्न बस्तर संभाग, अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जाना जाता है, शिक्षा के क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित संस्थानों की बड़ी संख्या के लिए भी उल्लेखनीय है। इन संस्थानों की वित्तीय कार्यप्रणाली और उनके कथित सामाजिक प्रभावों पर अक्सर बहस होती रही है। यह लेख इन संस्थानों की आय-व्यय के एक अनुमानित विश्लेषण के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, विशेषकर धर्मांतरण के संदर्भ में। एक प्रमुख मिशनरी स्कूल का वित्तीय अनुमान आइए, जगदलपुर में स्थित एक बड़े मिशनरी स्कूल का उदाहरण लेते हैं, जहाँ छात्रों की कुल संख्या लगभग 4000 है। यदि हम कक्षा 1 से 12 तक के प्रत्येक छात्र की औसत मासिक फीस ₹2000 मानें (कुछ कक्षाओं में कम और कुछ में अधिक होने की संभावना को ध्यान में रखते हुए), तो इसकी मासिक आय का अनुमान इस प्रकार लगाया जा सकता है: * **मासिक आय:** ₹2000 (औसत फीस) × 4000 (छात्र) = ₹80 लाख * **वार्षिक आय:** ₹80 लाख × 12 महीने = ₹9 करोड़ 60 लाख से अधिक अब, इसके संभावित खर्चों पर विचार...

पर स्त्री के प्रति पुरूष का स्वभाव

व्यक्ति राह पर आगे बढ़ते हुए एक कोमल स्वभाव, गरिमापूर्ण, आकर्षक कुंवारी स्त्री को देखता है।  व्यभिचारी पुरुष अपने आंखो से उसे देखते हुए आगे बढ़ते हैं, उनके लोभी, मन में उसके इस भौतिक शरीर के प्रति एक प्रकार की आकांक्षा जन्म लेती है और वह उसे प्राप्त करने हेतु लालायित हो उठता है ।  व्यभिचारी दंभी पुरूष उस स्त्री को प्राप्त करने के साम, दाम, दण्ड, भेद के प्रकारों पर विचार करने लगता है।  व्यभिचारी पुरुष अगर अविवाहित है तो उसके मन में विवाह की इक्षा जन्म लेती है और अगर वह विवाहित हैं तो वह उस स्त्री से मित्रता की चेष्टा करता है । कर्तव्य परायण विवाहित पुरुष अगर किसी आकर्षक सुंदर स्त्री को देख भी ले और उसके प्रति आकृष्ट भी हो जाए तो भी वह अपने मन को वश में करते हुए अपना ध्यान अपने धर्म पर केंद्रित करता है । कर्तव्य परायण विवाहित पुरुष जो व्यभिचारी तो नही है परन्तु कामुक स्वभाव का है वह किसी दूसरी सुंदर अप्सरा को देखने पर अपने मन में अपनी पत्नी की एक सुंदर छवि की कलपना करता है और अपने काम भावना को अपनी पत्नी की तरफ़ केंद्रित करता है।  एक भद्र पुरुष जो अपने जीवन को अब एक लक...

भगवान से प्रश्न:

प्रश्न : मैने भगवान से एक बात प्रश्न पूछा अगर वह किसी को मृत्यु देना चाहते हैं, तो वह व्यक्ति जब निद्रा में रहता है तब उससे निद्रा से ही अपने पास बुला लेना चाहिए इससे ना तो किसी को पीड़ा होगी, ना ही किसी को कष्ट होगा व्यक्ति सो रहा था और सोते-सोते आराम से चले जाएगा ।  मैने ईश्वर से यह भी कहा कि आप लोगों को कष्ट देना चाहते हैं । शायद आपको ने तड़पाना पसंद है उनकी तकलीफ देखकर शायद आपको आनंद आता होगा इसलिए आपने लोगों को तड़पा कर मारना पसंद है । लोग बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं उनके अंदर कष्ट उत्पन्न होता है पीड़ा होती है, उनका एक्सीडेंट होता है, वह रोड पर चलते हैं और कहीं पर उनका हाथ कट जाता है तो कहीं उनका पैर कट जाता है, किसी का सिर फूट जाता है, और दर्द तकलीफ से वह एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं क्या मृत्यु इस तकलीफ के साथ आना आवश्यक है ? उत्तर: प्रभु श्री हरि ने मेरे मन के अंदर ही उत्तर दिया कि वह किसी को तड़पाना नहीं चाहते परंतु लोगों को अपनी जीवन की बहुमूल्यता समझना आवश्यक है , कई बार लोग क्रोध में अथवा जलन ईर्ष्या ग्लानि अन्य भाव उसे भगवान से मृत्यू की इच्छा करते हैं , अ...

जगदलपुर से विशाखापट्टनम || यात्रा वृतांत

जगदलपुर से विशाखापट्टनम यात्रा  हमने ये यात्रा एक्सप्रेस विस्तादोम कोच के द्वारा जगदलपुर स्टेशन से शुरू की । वैसे तो ट्रेन का टाइम 9:55 दिन का था, जो ट्रेन 15 मिनट लेट से आई जो ठीक है । जगदलपुर के आगे या ट्रेन अमागुड़ा और कोडपाड़ रेलवे स्टेशन पर रुकती है केवल 2 मिनट के लिए । पूरे रास्ते में मनभावन नजारे आपको सुखद अनुभूति कराते चलेंगे । रेलवे के द्वारा दी गई सुविधा काफी अच्छी है । इस यात्रा के समय आपको एक बात ध्यान देने योग्य दिखेगी कि बस्तर उड़ीसा की आबोहवा तथा भौगोलिक स्थितियां काफी कुछ सामान नजर आती है , और यही वजह है कोरापुट ऐतिहासिक रूप बस्तर रियासत का हिस्सा था पर वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में यह उड़ीसा के साथ चला गया है । यात्रा के दौरान मालगाड़ी के लिए बार बार यात्री ट्रेनों को खड़ा कर देना आपको परेशान कर देगा । छोटे छोटे स्टेशन जरती , मालीगुड़ा होते हुए ट्रेन लगभग 2:15 बजे कोरापुट पहुंचती है ।

वीर क्यों वीर होते थे _ स्वप्निल तिवारी

वीर क्यों वीर होते थे । वीर क्यों वीर होते थे , क्या उनको डर नहीं लगता था , क्या भय उनके मन में ना था , संकट _ भूतों को देखकर , क्या मन विचलित न होता था । वीरों के भी मन में था डर भय उनको भी लगता था , पर संकट की तैयारी होती थी , लक्ष्य न उनका डीगता था । हाथों में तलवार लिए ,  संकट से वे टकराते थे,  अगर निहत्थे होते थे , शायद वह भी मर जाते थे ।